Friday, 5 October 2012

ग़ज़ल 1 5 8 ( क्या ज़माने ने की खता मौला )

क्या ज़माने ने की खता मौला ,
मिल रही सब को क्यों सज़ा मौला !
क्या हुआ खुशिओं से भरा दामन ,
सब की झोली में कुछ गिरा मौला !
हाल दुनिया का हो गया कैसा ,
खुद कभी आ कर देखता मौला !
दर्द इतने सबको दिए कैसे ,
दर्द मिटने की दे दवा मौला !
लोग जीने से आ चुके आजिज़ ,
कौन जाने है क्या हुआ मौला !
किसलिये  दुनिया को बनाया था ,
बैठ कर इक दिन सोचता मौला !
ख़त्म हो जाएं नफरतें सारी ,
कह रहा "तनहा" कर दिखा मौला !

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