Thursday, 11 October 2012

ग़ज़ल 1 2 8 ( ख़ुदकुशी न करने की कसम निभाई है )

ख़ुदकुशी न करने की कसम निभाई है ,
ज़िंदगी हमें जिस मोड़ पर भी लाई है !
झूमकर हमारी मौत पर सभी नाचें ,
आरज़ू सभी को आखिरी बताई है !
किस तरह जिया है, किस तरह मरा कोई ,
ग़म नहीं किसी को रस्म बस निभाई है !
कब तलक सहें हम ज़ुल्म इन खुदाओं के ,
इंतिहा हुई अब , ए खुदा दुहाई है !
है बहुत अंधेरी शाम आज की लेकिन ,
हो रही सुबह पैगाम ये भी लाई है !
है गुनाह क्यों दुनिया में प्यार करना भी ,
तूं बता ज़माने क्यों नज़र चुराई है !
चार दिन को आये सब यहां मुसाफिर हैं ,
पर नहीं किसी ने राह तक दिखाई है !
अब नहीं मिलेंगे इंतज़ार मत करना ,
कह गया है कोई , ज़िंदगी पराई है !
छोड़ उस जहां को आ गये यहां "तनहा" ,
क्या हसीं नज़ारा ,जब हुई रसाई है !

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