Thursday, 4 October 2012

ग़ज़ल 1 5 7 ( बना लो सभी के दिलों को ठिकाना )

बना लो सभी के दिलों को ठिकाना ,
तुम्हें याद करता रहेगा ज़माना !
कभी काम ऐसा नहीं दोस्त करते ,
जिसे खुद बनाया उसी को मिटाना !
बहुत दूर मंज़िल ,हैं राहें भी मुश्किल ,
न रुकना कभी तुम तुम्हें चलते जाना !
इबादत तो कोई तिजारत नहीं है ,
सभी को पता है न कोई भी माना !
हमें कल था आना ,नहीं आ सके पर ,
यही हर किसी से सुना है बहाना !
अभी साथ तेरा सभी लोग देते ,
न कोई भी आए हमें तब बुलाना !
वहीं जाल होगा शिकारी किसी का ,
नज़र आ रहा है जहां पर भी दाना !
बड़ी रौनकें कल यहां पर लगी थी ,
हुआ आज वीरान क्यों कर बताना !
रहा जगता रात भर आज "तनहा" ,
अभी सो रहा है न उसको जगाना !

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