Wednesday, 17 October 2012

दुनिया बदल रहा हूँ ( नज़्म ) 3 1 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

दुनिया बदल रहा हूं ,
खुद को ही छल रहा हूं !
डरने लगा हूं इतना ,
छुप कर के चल रहा हूं !
चलती हवा भी ठण्डी ,
फिर भी मैं जल रहा हूं !
क्यों आज ढूंढते हो ,
गुज़रा मैं कल रहा हूं !
अब थाम लो मुझे तुम ,
कब से फिसल रहा हूं !
लावा दबा हुआ है ,
ऐसे उबल रहा हूं  !
"तनहा" वहां किसी दिन ,
मैं भी चार पल रहा हूं !

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