Monday, 15 October 2012

अच्छा ही है ( कविता ) 7 6 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

अच्छा है ,
सफल नहीं हो सका मैं ,
अच्छा है ,
मुझे नहीं मिला ,
बहुत सारा पैसा कभी ,
अच्छा है ,
मिले हर दिन मुझे ,
नये नये दुःख दर्द ,
अच्छा है ,
बेगाने बन गये ,
अपने सब धीरे धीरे। 
अच्छा है ,
मिलता रहा ,
बार बार धोखा मुझको ,
अच्छा है ,
नहीं हुआ कभी ,
मेरे साथ न्याय ,
अच्छा है ,
पूरी नहीं  हुई ,
एक दोस्त की मेरी तलाश।
अच्छा है ,
मैं रह गया भरी दुनिया में ,
हर बार ही अकेला ,
अच्छा है ,
पाया नहीं कभी ,
सुख भरा जीवन ,
अच्छा है नहीं जी सका ,
चैन से कभी भी मैं !!
अगर ये सब ,
मिल गया होता मुझे तो ,
समझ नहीं पाता ,
क्या होते हैं दर्द पराये ,
शायद कभी न हो सकता मुझको ,
वास्तविक जीवन का ,
सच्चा एहसास ,
संवारा है  ,
ज़िंदगी की कश-म-कश ने ,
मुझको  ,
निखारा है  ,
हालात की तपिश ने ,
मुझको ,
आग में तपने के बाद ,
ही तो बनता है ,
खरा सोना कुंदन !!
चला नहीं ,
बाज़ार में दुनिया के ,
तो क्या हुआ ,
विश्वास है पूरा मुझको ,
अपने खरेपन पर ,
नहीं पहचान सके ,
लोग मुझे तो क्या ,
खुद को पहचानता हूं ,
मैं ठीक से ,
अपनी पहचान ,
नहीं पूछनी किसी दूसरे से ,
जानता हूं अपने  आप को मैं ,
अच्छा है !!

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