Tuesday, 30 October 2012

आत्म मंथन ( कविता ) 6 2 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

जाने कैसा था वो जहां ,
जाने कैसे थे वो लोग ,
बेगाने लगते थे अपने ,
अपनों में था बेगानापन !!
हर पल चाहत पाने की ,
कदम कदम खोने का डर ,
आकांक्षाओं आपेक्षाओं का ,
लगा रहता था हरदम मेला ,
लेकिन भीड़ में रह कर भी ,
हर कोई होता था अकेला !!
झूठ छल फरेब मुझको  ,
हर तरफ आता था नज़र ,
औरों से लगता था कभी ,
कभी खुद से लगता था डर  ! !
किसी मृगतृष्णा के पीछे ,
शायद सभी थे भाग रहे ,
भटकते रहते दिन भर को ,
रातों को सब थे जाग रहे ! !
अब जब खुद को पाया है ,
चैन तब रूह को आया है ,
नहीं कोई भी मदहोशी है ,
छाई बस इक ख़ामोशी है !!
छोड़ उस झूठे जहां को ,
अब हूं अपने ही संग मैं ,
अब नहीं कर पाएगा कभी ,
मुझे मुझ से अलग कोई ,
सब कुछ मिल गया मुझे ,
पा लिया है खुद को आज !!

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