Wednesday, 17 October 2012

आस्था ( कविता ) 5 8 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

सुलझे न जब मुझसे ,
कोई उलझन ,
निराशा से भर जाये ,
जब कभी जीवन ,
नहीं रहता ,
खुद पर है जब विश्वास ,
मन में जगा लेता ,
इक तेरी ही आस !!
नहीं बस में कुछ भी मेरे
जनता हूं ,
है सब हाथ में तेरे ,
ये मानता हूं ,
तेरे भरोसे ,
बेफिक्र हो जाता हूं ,
मुश्किलों से अपनी ,
न घबराता हूं !
लेकिन कभी मन में ,
करता हूं विचार ,
कितना सही है ,
आस्तिक होने  का आधार ,
शायद है कुछ अधूरी ,
तुझ पे मेरी आस्था ,
फिर भी दिखा देती है ,
अंधेरे में कोई रास्ता !!

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