Wednesday, 10 October 2012

सवाल है ( हास्य व्यंग्य कविता ) 8 भाग तीन - डॉ लोक सेतिया

जूतों में बंटती दाल है , अब तो ऐसा हाल है !
मर गए लोग भूख से , सड़ा गोदामों में माल है !
बारिश के बस आंकड़े , सूखा हर इक ताल है !
लोकतंत्र की बन रही , नित नई मिसाल है !
भाषणों से पेट भरते , उम्मीद की बुझी मशाल है !
मंत्री के जो मन भाए , वो बकरा हलाल है !
कालिख उनके चेहरे की , कहलाती गुलाल है !
जनता की धोती छोटी है , बड़ा सरकारी रुमाल है !
झूठ सिंहासन पर बैठा , सच खड़ा फटेहाल है !
जो न हल होगा कभी , गरीबी ऐसा सवाल है !
घोटालों का देश है , मत कहो कंगाल है !
सब जहां बेदर्द हैं , बस वही अस्पताल है !
कल जहां था पर्वत , आज इक पाताल है !
देश में हर कबाड़ी , हो चुका मालामाल है !
बबूल बो कर खाते आम , हो रहा कमाल है !
शीशे के घर वाला , रहा पत्थर उछाल है !
चोर काम कर रहे , पुलिस की हड़ताल है !
हास्य व्यंग्य हो गया , दर्द से बेहाल है !
जीने का तो कभी , मरने का सवाल है !
ढूंढता जवाब अपने , खो गया सवाल है !

No comments: