Wednesday, 10 October 2012

सवाल है ( हास्य व्यंग्य कविता ) 8 भाग तीन - डॉ लोक सेतिया

सवाल है ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

जूतों में बंटती दाल है ,
अब तो ऐसा हाल है ,
मर गए लोग भूख से ,
सड़ा गोदामों में माल है।

बारिश के बस आंकड़े ,
सूखा हर इक ताल है,
लोकतंत्र की बन रही ,
नित नई मिसाल है।

भाषणों से पेट भरते ,
उम्मीद की बुझी मशाल है,
मंत्री के जो मन भाए ,
वो बकरा हलाल है।

कालिख उनके चेहरे की ,
कहलाती गुलाल है,
जनता की धोती छोटी है ,
बड़ा सरकारी रुमाल है।

झूठ सिंहासन पर बैठा ,
सच खड़ा फटेहाल है,
जो न हल होगा कभी ,
गरीबी ऐसा सवाल है।

घोटालों का देश है ,
मत कहो कंगाल है,
सब जहां बेदर्द हैं ,
बस वही अस्पताल है।

कल जहां था पर्वत ,
आज इक पाताल है,
देश में हर कबाड़ी ,
हो चुका मालामाल है।

बबूल बो कर खाते आम ,
हो  रहा कमाल है,
शीशे के घर वाला ,
रहा पत्थर उछाल है।

चोर काम कर रहे ,
पुलिस की हड़ताल है,
हास्य व्यंग्य हो गया ,
दर्द से बेहाल है।

जीने का तो कभी ,
मरने का सवाल है।
ढूंढता जवाब अपने ,
खो गया सवाल है।

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