Sunday, 14 October 2012

ग़ज़ल 8 9 ( इंसान बेचते हैं ,भगवान बेचते हैं ) - लोक सेतिया "तनहा"

इंसान बेचते हैं , भगवान बेचते हैं - लोक सेतिया "तनहा"

इंसान बेचते है  ,   भगवान बेचते हैं ,
कुछ लोग चुपके चुपके ईमान बेचते हैं।

लो हम खरीद लाये इंसानियत वहीं से ,
हर दिन जहां शराफत शैतान बेचते हैं।

अपने जिस्म को बेचा  उसने जिस्म की खातिर ,
कीमत मिली नहीं ,  पर नादान बेचते है।

सब जोड़ तोड़ करके सरकार बन गई है ,
जम्हूरियत में ऐसे फरमान बेचते हैं।

फूलों की बात करने वाले यहां सभी हैं ,
लेकिन सजा सजा कर गुलदान बेचते हैं।

अब लोग खुद ही अपने दुश्मन बने हुए हैं ,
अपनी ही मौत का खुद सामान बेचते हैं।

सत्ता का खेल क्या है उनसे मिले तो जाना ,
लाशें खरीद कर जो , शमशान बेचते हैं। 

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