Sunday, 14 October 2012

ग़ज़ल 8 1 ( फलसफा ज़िंदगी का हमें सिखाने लगे हैं ) - लोक सेतिया "तनहा"

फ़लसफ़ा ज़िंदगी का हमें सिखाने लगे हैं - लोक सेतिया "तनहा"

फलसफा ज़िंदगी का हमें सिखाने लगे हैं ,
अब छुपा आंसुओं को वो मुस्कराने लगे हैं।

जान पाये नहीं जो कभी हमारी वफ़ा को ,
बात दिल की कहां वो जुबां पे लाने लगे हैं।

मिल गया खेत को बेच कर ये गर्दोगुबार ,
हर कहीं इस तरह कितने कारखाने लगे हैं।

आपकी इस बज़्म में हमीं नहीं बिनबुलाये ,
और कुछ लोग अक्सर यहां पे आने लगे हैं।

अब नहीं काम करती दवा न कोई दुआ ही ,
लोग "तनहा" यहां ज़हर खुद ही खाने लगे हैं।

No comments: