Tuesday, 30 October 2012

मतभेद ( कविता ) 6 4 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

  मतभेद ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

आज स्पष्ट ,
हो गई तस्वीर ,
जब मेरे विचारों की ,
ताज़ी हवा से ,
छट गई सारी धुंध ,
मिट गई हर दुविधा ,
हो गया अंतर्द्वंद का अंत। 

जान लिया ,
कि जाते हैं बदल ,
सही और गलत के ,
सारे मापदंड अब दुनिया में।

मगर मुझे चलना है ,
उसी राह पर ,
जिसे सही मानता हूं मैं ,
लोग चलते रहें,
उन राहों पर ,
सही मानते हों वो जिन्हें।

काश ,
जान लें सभी ,
विचारों के मतभेद के ,
इस अर्थ को ,
और हो जाए ,
अंत टकराव का ,
दुनिया वालों का ,
हर किसी से। 

मतभेद,
हो सकता है सभी का,
औरों से ही नहीं ,
कभी कभी ,
खुद अपने आप से भी।

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