Tuesday, 9 October 2012

दृष्टि भ्रम ( कविता ) डॉ लोक सेतिया -- 5 4 भाग दो

शहर में आता है ,
नया अफसर ,
जब भी कोई ,
करता है दावा ,
नहीं मैं पहले जैसे ,
अफसरों जैसा !
पत्रकार वार्ता में ,
देता है बयान ,
मैं कर दूंगा दूर ,
जनता की सब समस्याएं ,
लगा करेगा ,
मेरा खुला दरबार ,
आ सकता है कोई भी ,
करने फरियाद  ,
मुझे होगी बेहद ख़ुशी ,
कर इस शहर वालों की सेवा ,
उन से पहले भी ,
हर इक अफसर ने ,
दिया था बयान यही ,
दिया करेंगे यही फिर ,
उनके बाद आने वाले भी। 
बदलते रहेंगे अफसरान ,
रहेगा मगर हमेशा ,
उनका वही बयान ,
न बदला कभी ,
न बदलेगा कभी ,
प्रशासन और सरकार का बना बयान।
पढ़ सुन कर उनका बयान ,
कर उस पर एतबार ,
कोई चला जाए उनके दरबार ,
और करे जाकर उनसे ,
कर्तव्य निभाने की कभी बात  ,
लगता तब उनको ,
दे रहा चुनौती कोई सरकार को ,
सत्ता के उनके अधिकार को ,
जो न माने उसका उपकार ,
हो जाती नाराज़ है उससे सरकार।
कहलाता है जनसेवक ,
लेकिन शासक होता है शासक ,
आम है जनता अफसर हैं ख़ास ,
लाल बत्ती वाली उसकी कार ,
सुरक्षा कर्मी भी है साथ ,
है निराली उसकी शान ,
धरती के लोग जनता ,
अफसरों के लिए ,
ऊंचा आसमान।
लेकिन इक दिन ,
वो भी आता है ,
अफसर न अफसर कहलाता है ,
पद न उसका रह  जाता है ,
आम नागरिक बन तब ,
उसको है समझ आता ,
रहने को केवल धरती है ,
उड़ते थे जिस आकाश में ,
नहीं उसका कोई भी अस्तित्व ,
उसका वो नीला रंग ,
है मात्र एक दृष्टि भ्रम।         

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