Monday, 8 October 2012

फूल पत्थर के ( कविता ) डॉ लोक सेतिया -- 5 3 भाग दो

साहित्य में ,
बड़ा है उनका नाम ,
गरीबों के हमदर्द हैं ,
कुछ ऐसी बनी हुई ,
उनकी है पहचान।
गरीब बेबस शोषित लोग ,
उनकी रचनाओं के ,
होते हैं पात्र ,
मानवता के दर्द ,
की संवेदना ,
छलकती नज़र ,
आती है उनके शब्दों से।
मिले हैं दूर से ,
कई बार उनसे ,
उनके लिए ,
बजाई हैं तालियां ,
आज गये हम उनके घर ,
उनसे  करने को मुलाक़ात।
देखा जाकर वहां ,
नया एक चेहरा उनका ,
उनके घर के ,
कई काम करता है ,
किसी गरीब का ,
बच्चा छोटा सा ,
खड़ा था सहमा हुआ ,
उनके सामने ,
कह रहा था ,
हाथ जोड़ रोते हुए ,
मेरा नहीं है कसूर ,
कर दो मुझे माफ़।
लेकिन रुक नहीं रहे थे ,
उनके नफरत भरे बोल ,
घायल कर रहे थे ,
उनके अपशब्द ,
एक मासूम को ,
और मुझे भी ,
जो सुन रहा था हैरान हो कर।
डरने लगा था मन मेरा ,
देख उनके चेहरे पर ,
क्रूरता के भाव ,
उतर गया था जैसे ,
उनका मुखौटा ,
वो खुद लगने लगे थे ,
खलनायक ,
अपनी ही लिखी कहानी के।
लौट आया था मैं उलटे पांव ,
वे वो नहीं थे ,
जिनसे मिलने की ,
थी मुझे तमन्ना।
आजकल बिकते हैं बाज़ार में ,
कुछ खूबसूरत फूल,
पत्थर के बने हुए भी ,
लगते हैं हरदम ताज़ा ,
पास जाकर छूने से ,
लगता है पता ,
नहीं फूलों सी कोमलता का ,
उनमें कोई एहसास।
मुरझाते नहीं ,
मगर होते हैं संवेदना रहित ,
खुशबू नहीं बांटते ,
पत्थर के फूल कभी। 

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