Saturday, 6 October 2012

खुदा से बात ( कविता ) डॉ लोक सेतिया = 5 0 भाग दो

                      खुदा से बात ( कविता )

कहते हैं लोग ,
दुनिया में अच्छा-बुरा ,
जो भी होता है ,
सब होता है ,
तेरी ही मर्ज़ी से। 
अन्याय अत्याचार ,
धर्म तक का होता है ,
इस दुनिया में कारोबार।

तेरी मर्ज़ी है इनमें ,
मैं कर नहीं सकता ,
कभी भी स्वीकार।

सिर्फ इसलिए ,
कि याद रखें ,
भूल न जाएं तुझको ,
देते हो सबको ,
परेशानियां ,दुःख दर्द ,
समझते हैं ,
दुनिया के  कुछ लोग।

ऐसा तो करते हैं ,
कुछ  इंसान ,
कर नहीं सकता ,
खुद भगवान।

खुदा नहीं हो सकता ,
अपने बनाए इंसानों से ,
इतना बेदर्द ,
निभाता होगा अपना हर फ़र्ज़।

लगता है ,
कर दिया है बेबस तुझको ,
अपने ही बनाए इंसानों ने ,
जैसे माता पिता ,
हैं यहां बेबस संतानों से।

अपने लिए सभी ,
करते तुझ से प्रार्थना ,
मैं विनती कर रहा हूँ ,
पर तेरे लिए ,
बचा लो इश्वर अपनी ही शान ,
फिर से बनाओ अपना ये जहान ,
होगा हम सब पर एहसान।

अब फिर बनाओ ,
दुनिया इक ऐसी ,
चाहते हो तुम खुद जैसी ,
अच्छा प्यारा खूबसूरत ,
बनाओ इक ऐसा फिर से जहां ,
जिसमें न हो ,
दुःख दर्द कोई ,
मिलती हों सबको खुशियां।

अन्याय , अत्याचार का ,
जिसमें न हो निशां ,
ऐ खुदा ,
अब बनाना ,
इक ऐसी नई दुनिया।

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