Thursday, 4 October 2012

सीख लें हम भी जीना ( कविता ) डॉ लोक सेतिया = 4 9 भाग दो

ईश्वर देता है ,
हम सब को जीवन ,
जीना होता है ,
हमें स्वयं ,
किसे कहते हैं ,
लेकिन जीना ,
शायद जानते नहीं ,
हम सब !
अक्सर नहीं ,
सीख पाते हम ,
किस तरह ,
जीना है हमको ,
नहीं है कोई ,
जो सिखा सकता,
है कैसे जीना सबको !
खुद सीखना होता है सभी को ,
जीने का भी सलीका ,
कई बार उम्र ,
गुज़र जाती है ,
नहीं सीख पाते ,
हम जीने का तरीका ! !
जीना है कैसे ,
सीखते सीखते,
कट जाता पूरा ही जीवन ,
और वक़्त ही नहीं बचता ,
कि जी सकते कभी हम। 
लोग उलझे हैं ,
केवल इन सवालों में ,
कितना जिए ,
कैसे जिए ,
बेकार की उलझन है ये।
कितना अच्छा हो सब लोग ,
भुला कर बाकी ,
सारे सवालों को ,
तलाश करें ,
बस एक ही सवाल का ,
सही जवाब ,
किसे कहते हैं जीना ,
तभी तो जी सकेंगे ,
हम अपने जीवन को। 

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