Wednesday, 3 October 2012

दावे ही दावे हैं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया = 4 8 भाग दो

दावे ही दावे हैं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

चाबुक अर्थशास्त्र का जब चलता ,
संवेदना का नहीं होता काम  ,
सत्ता की तलवार देती हमेशा  ,
घायल कर अपना पैगाम।

जीत हार सब पहले से तय है  ,
झुका ले जनता अपना माथ ,
शासन के कुण्डल कवच और ,
बंधे हुए सब लोगों के हाथ।

चाकलेट खा भर लो पेट ,
नहीं अगर घर में हो रोटी,
सरकार कह रही क़र्ज़ लो ,
नुचवाओ फिर बोटी बोटी।

अंधेरा करता दावा है देखो ,
रौशनी वही अब लाएगा ,
कातिल खुद सच से कहता ,
मुझ से कब तक बच पाएगा।

कराह रही मानवता तक है  ,
झेल झेल कर नित नित बाण ,
नैतिकता का पतन हो रहा ,
कैसा हो रहा भारत निर्माण।

सरकारी ऐसे विज्ञापन ,
जिस जिस को भरमाएंगे ,
मांगने अधिकार गये जब ,
क्या घर वापस आ पाएंगे।

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