Wednesday, 3 October 2012

दावे ही दावे हैं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया = 4 8 भाग दो

चाबुक अर्थशास्त्र का जब चलता ,
संवेदना का नहीं होता काम !
सत्ता की तलवार देती हमेशा  ,
घायल कर अपना पैगाम !!
जीत हार सब पहले से तय है  ,
झुका ले जनता अपना माथ  !
शासन के कुण्डल कवच और ,
बंधे हुए सब लोगों के हाथ !!
चाकलेट खा भर लो पेट ,
नहीं अगर घर में हो रोटी !
सरकार कह रही क़र्ज़ लो ,
नुचवाओ फिर बोटी बोटी !!
अंधेरा करता दावा है देखो ,
रौशनी वही अब लाएगा !
कातिल खुद सच से कहता ,
मुझ से कब तक बच पाएगा !!
कराह रही मानवता तक है  ,
झेल झेल कर नित नित बाण !
नैतिकता का पतन हो रहा ,
कैसा हो रहा भारत निर्माण !!
सरकारी ऐसे विज्ञापन ,
जिस जिस को भरमाएंगे  !
मांगने अधिकार गये जब ,
क्या घर वापस आ पाएंगे !!

No comments: