Wednesday, 3 October 2012

आशियाँ ( कविता ) डॉ लोक सेतिया = 4 7 भाग दो

आशियां ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

अपना इक आशियां बनाने में ,
अपनी सारी उम्र लगा दी थी।

और सारे जहां से दूर कहीं ,
एक दुनिया नई बसा ली थी।

फूल कलियां चांद और तारे ,
इन सभी से नज़र चुरा ली थी।

खूबसूरत सा घर बनाया था ,
प्यार से खुद उसे सजाया था।

आह ! मगर बदनसीबी अपनी ,
खुद ही अपना जहां लुटा बैठे।

इतनी ख़ुशी कि जश्न मनाने में ,
हम आशियां को ही जला बैठे। 

No comments: