Sunday, 14 October 2012

ग़ज़ल 4 1 ( जाग जाओ बहुत सो लिये ) - लोक सेतिया "तनहा"

जाग जाओ बहुत सो लिये - लोक सेतिया "तनहा"

जाग जाओ बहुत सो लिये  ,
दिन चढ़ा ,आंख तो खोलिये।

रौशनी कब से है मुन्ताज़िर ,
खिड़कियां ज़ेहन की खोलिये।

बेगुनाही में खामोश क्यों ,
बोलिये और सच बोलिये।

राह में था अकेला कोई ,
बढ़ के साथ उसके हम हो लिये।

हम को कोई न ग़म था मगर ,
ग़म पे औरों के हम रो लिये।

खुद को धोखा न देना कभी ,
आप अपने से सच बोलिये।

ज़िंदगी का करो सामना ,
राज़ "तनहा" सभी खोलिये। 

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