Tuesday, 9 October 2012

तीन छोटी कवितायेँ ( पूँजी // शोर // फुर्सत ) डॉ लोक सेतिया - 5 5 भाग दो

1                                                 पूंजी ( कविता )
सफलता की बता कर बातें ,
बांटनी चाही खुशियां ,
दोस्तों के संग !
प्रतिद्वंदी बन गये  ,
दोस्त सब ,
लगे करने ईर्ष्या मुझ से ! !
मिले जितने भी दुःख दर्द ,
दोस्तों से,सभी अपनों से ,
दुनिया वालों से छुपा कर ,
रखे अपने सीने में !
दर्द की वो सारी दौलत ,
है बाकी मेरे पास ,
नहीं समाप्त होगी ,
जो जीवन प्रयन्त !!
    2                               शोर ( कविता )
वो सुनता है ,
हमेशा सभी की फ़रियाद ,
नहीं लौटा कभी कोई ,
दर से उसके खाली हाथ  !
शोर बड़ा था ,
उसकी बंदगी करने वालों का ,
शायद तभी ,
नहीं सुन पाया ,
मेरी सिसकियों की ,
आवाज़ को आज खुदा  !!
3                                 फुर्सत ( कविता  )
मुझे पता चला ,
दुखों का पर्वत टूटा,
तुम्हारे तन मन पर  !
निभानी तो है औपचारिकता ,
सांत्वना व्यक्त करने की ,
मगर करूं क्या ,व्यस्त हूं ,
अपनी दुनिया में मस्त हूं  !
फुर्सत नहीं है ,
ज़रा भी अभी ,
आऊंगा तुम्हारे पास ,
मैं दिखावे के आंसू बहाने ,
मिलेगी जब कभी फुर्सत मुझे !!            

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