Saturday, 20 October 2012

हाँ किया प्यार मैंने ( कविता ) 3 2 डॉ लोक सेतिया

  3 2     हां किया प्यार मैंने ( कविता )

किया तो होगा
तुमने भी कभी न कभी
किसी न किसी से प्यार।

धड़कता होगा
तुम्हारा दिल भी
देख कर किसी को।

मुमकिन है
कर दिया हो तुमने
इज़हार मोहब्बत का
अथवा हो सकता है
रख ली हो
दिल की बात दिल में
समाज के डर से
या इनकार के  डर से।

मगर मैं जानती हूं 
ऐसा हुआ होगा
ज़रूर जीवन में एक बार
स्वाभाविक है ये 
सभी को हो ही जाता है
एहसास प्यार का।

आज जब मैंने कर लिया
प्यार का एहसास
और कर दिया परिणय निवेदन
करना चाहा स्वयं को समर्पित।

उसे जिसे चाहा मेरे मन ने
तो क्यों मान लिया गया
एक अपराध उसे।

क्यों दे दिया गया
मेरे प्यार  की
पावन  भावना को
चरित्र हीनता का नाम।

क्या इसलिये
कि देना नहीं चाहता
पुरुष समाज नारी को कभी भी
अधिकार चुनने का।

पहल करने का अधिकार नहीं है
औरत को
हर पुरुष चाहता है
नारी से मूक स्वीकृति
अथवा अधिक से अधिक
इनकार वह भी शायद
क्षमा याचना के साथ।

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