Wednesday, 17 October 2012

दुनिया बदल रहा हूँ ( नज़्म ) 3 1 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

दुनिया बदल रहा हूं ( नज़्म ) लोक सेतिया

दुनिया बदल रहा हूं ,
खुद को ही छल रहा हूं।

डरने लगा हूं इतना ,
छुप कर के चल रहा हूं।

चलती हवा भी ठण्डी ,
फिर भी मैं जल रहा हूं।

क्यों आज ढूंढते हो ,
गुज़रा मैं कल रहा हूं।

अब थाम लो मुझे तुम ,
कब से फिसल रहा हूं।

लावा दबा हुआ है ,
ऐसे उबल रहा हूं।

"तनहा" वहां किसी दिन ,
मैं भी चार पल रहा हूं। 

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