Friday, 12 October 2012

हदिसे दिल पे आते रहे ( नज़्म ) 2 6 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

हादिसे दिल पे आते रहे - लोक सेतिया "तनहा"

हादिसे दिल पे आते रहे ,
दास्तां हम सुनाते रहे।

बेगुनाही भी थी इक खता ,
हम सज़ा जिसकी पाते रहे।

मौत हमसे रही दूर ही ,
लाख हम ज़हर खाते रहे।

हमने सपने संजोए थे जो ,
ज़िंदगी भर रुलाते रहे।

तंग आकर करूं ख़ुदकुशी ,
लोग इतना सताते रहे।

दिल बहल जाये ,कुछ ,इसलिये  ,
शायरी में लगाते रहे। 

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