Wednesday, 10 October 2012

सीता का पश्चाताप ( कविता ) 2 1 डॉ लोक सेतिया

  2 1    सीता का पश्चाताप ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

मुझे स्वयं बनना था
एक आदर्श
नारी जाति के लिये।

प्राप्त कर सकती थी
मैं स्वयं अपनी स्वाधीनता
अधिकार अपने।

कर नहीं पाता
कभी भी रावण
मेरा हरण।

मैं स्वयं कर देती
सर्वनाश उस पापी का
मानती हूँ आज मैं
हो गई थी मुझसे भयानक भूल।

पहचाननी थी
मुझे अपनी शक्ति
मुझे नहीं करनी थी चाहत
सोने का हिरण पाने की।

मेरे अन्याय सहने से
नारी जगत को मिला
एक गलत सन्देश।

काश तुलसीदास
लिखे फिर एक नई रामायण
और एक आदर्श बना परस्तुत करे
मेरे चरित्र को
उस युग की भूल का
प्राश्चित हो इस कलयुग में। 

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