Thursday, 4 October 2012

ग़ज़ल 1 5 7 ( बना लो सभी के दिलों को ठिकाना ) - लोक सेतिया "तनहा"

बना लो सभी के दिलों को ठिकाना - लोक सेतिया "तनहा"

बना लो सभी के दिलों को ठिकाना ,
तुम्हें याद करता रहेगा ज़माना।

कभी काम ऐसा नहीं दोस्त करते ,
जिसे खुद बनाया उसी को मिटाना।

बहुत दूर मंज़िल ,हैं राहें भी मुश्किल ,
न रुकना कभी तुम तुम्हें चलते जाना।

इबादत तो कोई तिजारत नहीं है ,
सभी को पता है न कोई भी माना।

हमें कल था आना ,नहीं आ सके पर ,
यही हर किसी से सुना है बहाना।

अभी साथ तेरा सभी लोग देते ,
न कोई भी आए हमें तब बुलाना।

वहीं जाल होगा शिकारी किसी का ,
नज़र आ रहा है जहां पर भी दाना।

बड़ी रौनकें कल यहां पर लगी थी ,
हुआ आज वीरान क्यों कर बताना।

रहा जगता रात भर आज "तनहा" ,
अभी सो रहा है न उसको जगाना।

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