Tuesday, 11 September 2012

भगवान की वर्कशॉप ( हास्य कविता ) 3 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

होली का था वो त्यौहार ,
भंग का चढ़ा हुआ था खुमार ,
जा पहुंचा मैं उस पार ,
जहां चल रहा अजब था कारोबार ! !
प्रभु तो करते थे विश्राम ,
कारीगर बना रहे थे इन्सां  हज़ार ,
हाथ पैर सर का लेबल लगे ,
मसाले रखे थे नम्बरवार ! !
बोला इक कारीगर , अब थक गया ,
बना दिए आज कई हज़ार ,
प्रभु बोले और बनाओ तुम  ,
धरती पर हैं अभी दरकार ! !
यूं जल्दी की गड़बड़ में  ,
बना कोई बेवकूफ कोई समझदार ,
एक बैच ऐसा बन गया  ,
लगा जाएगा मसाला बेकार ! !
बुलाकर प्रभु को दिखलाया ,
देखो ये क्या हुआ सरकार ,
कुछ दिमाग बन गए जरा बड़े ,
खोपड़ी में जाने से करते इनकार  ! !
प्रभु बोलो कोई बात नहीं ,
करो इनके सरों का भी विस्तार ,
यूं ही नहीं अब ये मानेंगे  ,
इनको बना दो तुम साहित्यकार ,
कुछ लेखक और कवि बना दो ,
शायर कुछ बाकी पत्रकार  ! !
सुन कर प्रभु के शुभ विचार ,
खोपड़ी में जाने को हुए दिमाग तैयार ,
देखा था छिपकर मैंने ,
जब हो रहा था ये चमत्कार ! !
प्रभु ने बुलाया मुझे अपने पास ,
कहा प्यार से ,सुन बरखुरदार ,
मैं नहीं करता इंसानों का  ,
करता क्यों इन्सान मेरा कारोबार ,
इंसानियत का सबक नहीं पढ़ते ,
बने हुए धर्म के ठेकेदार !!

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