Saturday, 1 September 2012

वतन के घोटालों पर इक चौपाई लिखो ( व्यंग्य कविता ) 5 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

वतन के घोटालों पर इक चौपाई लिखो ,
आए पढ़ाने तुमको नई पढ़ाई लिखो !
जो सुनी नहीं कभी हो ,वही सुनाई लिखो ,
कहानी पुरानी मगर ,नई बनाई लिखो !
क़त्ल शराफ़त का हुआ ,लिखो बधाई लिखो ,
निकले जब कभी अर्थी ,उसे विदाई लिखो !
सच लिखे जब भी कोई ,कलम घिसाई लिखो ,
मोल विरोध करने का, बस दो पाई लिखो !
बदलो शब्द रिश्वत का ,बढ़ी कमाई लिखो ,
पाक करेगा दुश्मनी ,उसको भाई लिखो !
देखो गंदगी फैली ,उसे सफाई लिखो ,
नहीं लगी दहलीज पर ,कोई काई लिखो !
पकड़ लो पांव उसी के ,यही भलाई लिखो ,
जिसे बनाया था खुदा ,नहीं कसाई लिखो !

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