Saturday, 22 September 2012

विवशता ( कविता ) 3 9 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

खाली है मेरा भी दामन ,
तुम्हारे आंचल की तरह ,
कुछ भी नहीं पास मेरे ,
तुम्हें देने को  !!
तुम्हारी तरह है मुझे भी ,
तलाश एक हमदर्द की ,
मेरे मन में भी है बाकी ,
कोई अधूरी प्यास !!
ढूंढती हैं ,
तुम्हारी नज़रें जो मुझ में  ,
कहने को लरजते हैं ,
तुम्हारे होंट बार बार ,
समझता हूँ लेकिन  ,
समझना नहीं चाहता मैं ,
प्यार भरी नज़रों की ,
तुम्हारी उस भाषा को ! !
छुप सकती नहीं ,
मन की कोमल भावनाएं  ,
जानते हैं हम दोनों !!
मत आना मेरे करीब तुम  ,
भरे हुए हैं ,
अनगिनत कांटे ,
दामन में मेरे ,
हैं नाज़ुक उंगलियां तुम्हारी  ,
कहीं चुभ न जाए ,
शूल कोई उनको ! !
किसी को देने को कोई फूल  ,
लाल पीला या गुलाबी  ,
नहीं पास मेरे ,
कभी नहीं मिल पाएंगे  ,
हम तोड़ कर ,
दुनिया के सारे बंधनों को ,
बस आंखों ही आंखों में  ,
करते रहें बात हम ,
ख़ामोशी से यूं ही करें  ,
हर दिन मुलाक़ात हम !!

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