Saturday, 8 September 2012

मैं नहीं था ऐसा कभी ( कविता ) 3 1 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

आज लिख रहा है ,
रंगबिरंगे फूलों से ,
रौशनी की किरणों से ,
हमारी कहानी कोई  ! !
उसे क्या मालूम ,
पाए हैं हमने तो कांटे,
जीवन भर ! !
छाया रहा ,
हमारी ज़िंदगी पर ,
सदा इक घना अंधेरा है ,
पल पल जीवन का ,
गुज़रा है इस तरह ,
सर्द रातें खुले गगन में,
काटे कोई जिस तरह ! !
कभी किया नहीं,
हमने ज़िक्र तक किसी से ,
अपने दुःख दर्द,
अपनी परेशानियों का  ! !
सफलता , ख़ुशी ,
रही बहुत दूर हमसे ,
मगर दुनिया वाले ,
कहते रहे,
हमें मुक्कदर का सिकंदर ! !
बना रहा हमारा चित्र ,
है वो चित्रकार जो ,
मिला ही नहीं ,
कभी हमें जीते जी ,
ये मेरी जीवन कथा ,
ये चित्र  ,
दोनों हैं किसी की ,
सुंदर कल्पनाएं  ,
नहीं है इनमें ,
कोई सच्चाई   ! !
हां देखा हो शायद ,
ऐसा सपना कभी मैंने ,
किसी दिन ,
अपना दिल ,
बहलाने को ! !

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