Sunday, 2 September 2012

श्रधान्जली सभा ( कविता ) 1 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया ) हास्य-व्यंग्य

टेड़ा है बहुत  ,
स्वर्ग और नर्क का सवाल  ,
सुलझाएं जितना इसे  ,
उजझता जाता है जाल।
आपको दिखलाता हूं  ,
मैं आंखों देखा हाल  ,
देखोगे इक दिन आप भी  ,
मैंने जो देखा कमाल।
बहुत भीड़ थी स्वर्ग में  ,
बड़ा बुरा वहां का हाल  ,
छीना झपटी मारा मारी ,
और बेढंगी थी चाल।
नर्क को जाकर देखा  ,
कुछ और ही थी उसकी बात  ,
दिन सुहाना था वहां  ,
और शांत लग रही रात।
पूछा था भगवान से  ,
स्वर्ग और नर्क हैं क्या  ,
और उसने मुझे  ,
ये सब कुछ दिया था दिखा।
घबराने लगा जब मैं  ,
थाम कर तब मेरा हाथ  ,
बतलाई थी भगवान ने  ,
तब मुझे सारी बात !
श्रधांजली सभा होती है  ,
सब के मरने के बाद  ,
सब मिल कर जहां  ,
करते हैं मुझसे फ़रियाद ,
स्वर्ग लोक में दे दूं  ,
सबको मैं कुछ स्थान  ,
बेबस हो गया हूं मैं  ,
अपने भगतों की बात मान।
शोक सभाओं में  ,
ऐसा भी कहते हैं लोग  ,
स्वर्ग लोक को जाएगा  ,
आये  हैं जो इतने लोग।
देखकर शोकसभाओं की भीड़  ,
घबरा जाता हूँ मैं  ,
मुझको भी होने लगा है  ,
लोकतंत्र सा कोई रोग।
कहां जाना चाहते हो  ,
सब से पूछते हैं हम  ,
नर्क नहीं मांगता कोई  ,
जगह स्वर्ग में है कम।
नर्क वालों के पास  ,
है बहुत ही स्थान  ,
वहां रहने वालों की  ,
है अलग ही शान  ,
रहते हैं वहां  ,
सब अफसर डॉक्टर वकील  ,
बात बात पर देते हैं  ,
वे कोई नई दलील।
करवा ली हैं बंद मुझसे  ,
नर्क की सब सजाएं  ,
देकर रोज़ मानवाधिकारों की दुआएं।
बना ली है नर्क वालों ने  ,
अपनी दुनिया रंगीन  ,
मांगने पर स्वर्ग वालों को  ,
मिलती नहीं ज़मीन।
नर्क ने बनवा ली हैं ,
ऊंची ऊंची दीवारें  ,
स्वर्ग में लगी हुई हैं  ,
बस कांटेदार तारें ,
नर्क में ही रहते हैं  ,
सब के सब बिल्डर  ,
स्वर्ग में बन नहीं सकता कोई भी घर !
स्वर्ग नर्क से दूर भी  ,
बैठे थे कुछ नादान  ,
फुटपाथ पे पड़ा हुआ था  ,
जिनका सामान ,
उन्हें नहीं मिल सका था  ,
दोनों जगह प्रवेश  ,
जो रहते थे पृथ्वी पर  ,
बन कर खुद भगवान !
किया था भगवान ने  ,
मुझसे वही सवाल  ,
स्वर्ग नर्क या है बस ,
मुक्ति का ही ख्याल !
कहा मैंने तब सुन लो  ,
ए दुनिया के तात  ,
दोहराता हूँ मैं आज  ,
एक कवि की बात।
मुक्ति दे देना तुम  ,
गरीब को भूख से  ,
दिला सको तो दिला दो  ,
मानव को घृणा से मुक्ति ,
और नारी को  ,
दे देना मुक्ति अत्याचार से  ,
मुझे जन्म देते रहना  ,
बार बार इनके निमित !
मित्रो ,
मेरे लिये  स्वर्ग की  ,
प्रार्थना मत करना  ,
न ही कभी मेरी  ,
मुक्ति की तुम दुआ करना ,
मेरी इस बात को  ,
तब भूल मत जाना  ,
मेरी श्रधांजली सभा में  ,
जब भी आना !

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