Saturday, 8 September 2012

मुझ बिन ( कविता ) 3 0 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कब होता है,
किसी के ,
होने का एहसास ,
समझ आता है ,
न होने का एहसास !
जब नहीं होता है ,
कोई पास ,
लगता है तब ,
कि था कितना करीब ,
जब मिला करते थे रोज़ ,
होती न थी  ,
कभी बातचीत भी,
कहते हैं अब ,
मिले हो तुम ,
कितनी मुद्दत के बाद !!
कल पूछा था उसने ,
क्या छोड़ दिया लिखना ,
बीत गये बहुत दिन,
पढ़े हुए कहानी कोई   ! !
ढूंढते रहे थे,
उस दिन ,
मुशायरे में तुम्हें ,
सुन लेते कोई ग़ज़ल ,
फिर तुमसे ! !
लिखता रहा जब तक ,
नहीं कहा था कभी उसने ,
हमसे ,
लगता है अच्छा ,
तुम्हें पढ़ना ,
सुनाया करता था जब ,
सुनना चाहता था ,
कहां कोई मुझे ! !
न होना मेरा लग रहा है ,
बेहतर मेरे होने से ,
आज कोई देखता ही नहीं मुझे ,
मेरे बाद होंगी ,
शायद बातें मेरी ,
कोई किसी दिन,
कहेगा किसी से ,
कभी होता था यहां,
मुझ सा भी कोई इंसान ! !

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