Saturday, 22 September 2012

मृग तृष्णा ( कविता ) 4 0 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

हम चले जाते हैं उनके पास  ,
निराशा और परेशानी में  ,
सोचकर कि वे कर सकते हैं ,
जो हो नहीं पाता है  ,
कभी भी हमसे  ! !
वे जानते हैं वो सब  ,
नहीं जो भी हमें मालूम ,
तब वे बताते हैं हमें ,
कुछ दिन , महीने , वर्ष ,
रख लो थोड़ा सा धैर्य  ,
सब अच्छा है उसके बाद ,
हमें मिल जाती है  ,
इक तसल्ली सी  ,
सोचकर कि आने वाले हैं ,
दिन अच्छे हमारे !!
कट जाती है उम्र इसी तरह  ,
झेलते दुःख ,परेशानियां  ,
और जी लेते हैं हम ,
आने वाले अच्छे दिनों की ,
झूठी उम्मीद के सहारे  !!
टूटने लगता है जब धैर्य  ,
डगमगाने लगता है विश्वास  ,
फिर चले जाते हैं  ,
हम बार बार उन्हीं के पास  ,
ले आते हैं वही झूठा दिलासा  ,
और नहीं कुछ भी उनके पास ,
उनका यही तो है कारोबार  ,
झूठी उम्मीदों ,दिलासों का !!
शायद होती है ,
इस की ज़रूरत हमें ,
जीने के लिये ,जब ,
निराशा भरे जीवन में ,
नहीं नज़र आती ,
कोई भी आशा की किरण  ,
जो जगा सके ज़रा सी आशा  ,
झूठी ही सही !!
सच साबित होती नहीं बेशक  ,
उनकी भविष्यवाणियां कभी भी  ,
तब भी चाहते हैं ,
बनाए रखें उन पर ,
अपना विश्वास  ,
ऐसा है ज़रूरी उनके लिए भी ,
शायद उससे अधिक हमारे लिये ,
जीने की आशा के लिए !!

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