Thursday, 6 September 2012

काश ( कविता ) 2 6 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

चले जाते हैं ,
प्रतिदिन हम लोग ,
मंदिर,
मस्जिद,
गुरुद्वारे,
गिरजा घर!
करते हैं प्रार्थना ,
सुन लेते हैं ,
बातें धर्मों  की ,
झुका कर अपना सर  !
और मान लेते हैं,
कि प्रसन्न ,
हो गया है ईश्वर ,
हमारे स्तुतिगान से !
मगर कभी जब कहीं ,
कोई देता है ,
दिखाई हमें ,
दुःख में,
निराशा में ,
घबरा कर ,
आंसू बहाता हुआ ,
तब हम ,
चुरा लेते हैं नज़रें ,
और गुज़र जाते हैं ,
कुछ दूर हटकर !
हमारी आस्था ,
हमारा धर्म ,
जगा नहीं पाता ,
हमारे मन में ,
मानवता के ,
दर्द के एहसास को !
काश !
कह पाता  ,
ईश्वर तब हमें ,
व्यर्थ है हमारा  ,
उसके दर पे आना !

No comments: