Saturday, 1 September 2012

ग़ज़ल 7 7 ( अपनी मज़बूरी बतायें कैसे )

अपनी मज़बूरी बतायें कैसे ,
ज़ख्म दिल के हैं दिखायें कैसे !
आशियाने में हमें रहना है ,
अपना घर खुद ही जलायें कैसे !
छोड़ आये हम जिसे यूँ ही कभी ,
अब उसी घर खुद ही जायें कैसे !
एक मुर्दा जिस्म हैं अब हम तो ,
अब दवा खायें तो खायें कैसे !
नाम जिसका ख़ामोशी रखना है ,
दास्तां सब को सुनायें कैसे !
दर्द दे कर भूल जाता हो जो ,
उस सितमगर को बुलायें कैसे !
जब नहीं बाकी रहा ताल्लुक ही ,
बोझ यादों का उठायें  कैसे !
जो सुनानी हो उसी को "तनहा" ,
ग़ज़ल महफ़िल में सुनायें कैसे  !

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