Sunday, 2 September 2012

आँखों देखा हाल ( हास्य व्यंग्य कविता ) 2 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

सुबह बन गई थी जब रात ,
ये है उस दिन की बात !
सांच को आ गई थी आंच  ,
दो और दो बन गए थे पांच !
कत्ल हुआ सरे बाज़ार  ,
मौका ए वारदात से ,
पकड़ कातिलों को ,
कोतवाल ने ,
कर दिया चमत्कार !
तब शुरू हुआ ,
कानून का खेल  ,
भेज दिया अदालत ने  ,
सब मुजरिमों को सीधा जेल !
अगले ही दिन ,
कोतवाल को ,
मिला ऊपर से ऐसा संदेश ,
खुद उसने माँगा  ,
अदालत से ,
मुजरिमों की रिहाई का आदेश !
कहा अदालत से ,
कोतवाल ने ,
हैं हम ही गाफ़िल  ,
है कोई और ही कातिल !
किया अदालत ने ,
सोच विचार  ,
नहीं कोतवाल का ऐतबार ,
खुद रंगे हाथ  ,
उसी ने पकड़े  कातिल  ,
और बाकी रहा क्या हासिल !
तब पेश किया कोतवाल ने  ,
कत्ल होने वाले का बयान  ,
जिसमें तलवार को  ,
लिखा गया था म्यान !
आया न जब  ,
अदालत को यकीन  ,
कोतवाल ने बदला  ,
पैंतरा नंबर तीन  !
खुद कत्ल होने वाले को ही  ,
अदालत में लाया गया  ,
और लाश से ,
फिर वही बयान दिलवाया गया !
मुझसे हो गई थी ,
गलत पहचान  ,
तलवार नहीं हज़ूर  ,
है ये म्यान   ,
मैंने तो देखी ही नहीं कभी तलवार ,
यूँ कत्ल मेरा तो  ,
होता है बार बार  ,
कहने को आवाज़ है मेरा नाम  ,
मगर आप ही बताएं  ,
लाशों का बोलने से क्या काम !
हो गई अदालत भी लाचार  ,
कर दिये बरी सब गुनहगार  ,
हुआ वही फिर इक बार ,
कोतवाल का कातिलों से प्यार !
झूठ मनाता रहा जश्न  ,
सच को कर के दफन  ,
इंसाफ बेमौत मर गया ,
मिल सका न उसे कफन !

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