Sunday, 16 September 2012

ग़ज़ल 8 5 ( लोग कहते हैं कुछ , सोचते और हैं )

लोग कहते हैं कुछ , सोचते और हैं ,
हर किसी के हुए यूं अजब तौर हैं !
जा रहे हैं किधर ,कुछ न आता नज़र ,
समझ आता नहीं ,क्या नये दौर हैं !
इन मशीनों से जाने किसे क्या मिला ,
छिन गये कुछ गरीबों से बस कौर हैं !
भूख से मर रहे लोग कैसे जियें  ,
क्या कभी आप सब कर रहे गौर हैं !
बात दस्तूर की जब हो कहते नहीं ,
बन गए किसलिये आप सिरमौर हैं !
अब सभी पूछते हैं पता आपका ,
कुछ तो "तनहा" कहो अब कहां ठौर हैं !

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