Monday, 17 September 2012

ग़ज़ल 9 6 ( मिलने को दुनिया में क्या न मिला )

मिलने को दुनिया में क्या न मिला ,
मझधार में नाखुदा न मिला !
सब को दिखाई थी राह मगर ,
मंज़िल का अपनी पता न मिला !
हमने बनाये थे घर तो कई ,
इक दिन हमें आसरा न मिला !
ढूंढा किताबों में हमने बहुत ,
जीने का पर फलसफा न मिला !
चलता रहे साथ साथ मिरे ,
अब तक वही हमनवा न मिला !
मिल के रहें लोग सब जिस में ,
उस घर का "तनहा" पता न मिला !

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