Monday, 17 September 2012

ग़ज़ल 8 7 ( सरकार है बेकार है लाचार है )

सरकार है बेकार है लाचार है ,
सुनती नहीं जनता की हाहाकार है !
फुर्सत नहीं समझें हमारी बात को ,
कहने को पर उनका खुला दरबार है !
रहजन बना बैठा है रहबर आजकल ,
सब की दवा करता जो खुद बीमार है !
जो कुछ नहीं देते कभी हैं देश को ,
अपने लिए सब कुछ उन्हें दरकार है !
इंसानियत की बात करना छोड़ दो ,
महंगा बड़ा सत्ता से करना प्यार है !
हैवानियत को ख़त्म करना आज है ,
इस बात से क्या आपको इनकार है !
ईमान बेचा जा रहा कैसे यहां ,
देखो लगा कैसा यहां बाज़ार है !
है पास फिर भी दूर रहता है सदा ,
मुझको मिला ऐसा मेरा दिलदार है !
अपना नहीं था ,कौन था देखा जिसे ,
"तनहा" यहां अब कौन किसका यार है !

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