Sunday, 2 September 2012

ग़ज़ल 8 0 ( इस ज़माने में जीना दुश्वार सच का )

इस ज़माने में जीना दुश्वार सच का ,
अब तो होने लगा कारोबार सच का !
हर गली हर शहर में देखा है हमने ,
सब कहीं पर सजा है बाज़ार सच का !
ढूंढते हम रहे उसको हर जगह , पर ,
मिल न पाया कहीं भी दिलदार सच का !
झूठ बिकता रहा ऊंचे दाम लेकर ,
बिन बिका रह गया था अंबार सच का !
अब निकाला जनाज़ा सच का उन्होंने ,
खुद को कहते थे जो पैरोकार सच का !
कर लिया कैद सच , तहखाने में अपने ,
और खुद बन गया पहरेदार सच का !
सच को ज़िन्दा रखेंगे कहते थे सबको ,
कर रहे क़त्ल लेकिन हर बार सच का !
हो गया मौत का जब फरमान जारी ,
मिल गया तब हमें भी उपहार सच का !
छोड़ जाओ शहर को चुपचाप "तनहा" ,
छोड़ना गर नहीं तुमने प्यार सच का  !

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