Sunday, 16 September 2012

ग़ज़ल 7 4 ( प्यार भरे कुछ जाम रखे हैं )

प्यार भरे कुछ जाम रखे हैं ,
आज तुम्हारे नाम रखे हैं !
जिनको खरीद सका न ज़माना ,
अब खुद ही बेदाम रखे हैं !
पत्थर चलने की खातिर भी ,
शीशे वाले मुकाम रखे हैं !
खुद ही अपनी रुसवाई के ,
हमने चरचे आम रखे हैं  !
जिन पर बातें दिल की लिखीं हैं ,
ख़त वो सभी बेनाम रखे हैं !
घर पर जा कर देखो "तनहा" ,
राज़ कई खुले-आम रखे हैं  !

No comments: