Saturday, 1 September 2012

ग़ज़ल 7 3 ( जिन के ज़हनों में अँधेरा है बहुत )

जिन के ज़हनों में अंधेरा है बहुत ,
दूर उन्हें लगता सवेरा है बहुत !
एक बंजारा है वो , उसके लिये ,
मिल गया जो भी बसेरा है बहुत !
उसका कहने को भी कुछ होता नहीं ,
वो जो कहता है कि मेरा है बहुत !
जो बना फिरता मुहाफ़िज़ कौम का ,
जानते सब हैं , लुटेरा है बहुत !
राज़ "तनहा" जानते हैं लोग सब ,
नाम क्यों बदनाम तेरा है बहुत  !

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