Sunday, 9 September 2012

ग़ज़ल 2 9 ( चल रहे हैं धूप में छाया करो )

चल रहे हैं धूप में छाया करो ,
गेसुओं को हमपे लहराया करो !
जैसे सूरज को छिपाती है घटा ,
उस तरह आंचल का तुम साया करो !
और भी हो जाएंगे पत्ते हरे ,
प्यार की शबनम से नहलाया करो !
प्यास के मारों को तुम झरना बनो ,
यूं न दरिया बन के बह जाया करो !
तिनके चुन चुन कर बने हैं घौंसले ,
बिजलियो उनपर तरस खाया करो !

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