Sunday, 9 September 2012

ग़ज़ल 1 7 ( झूठ को सच करे हुए हैं लोग )

झूठ को सच करे हुए हैं लोग ,
बेज़ुबां कुछ डरे हुए हैं लोग !
नज़र आते हैं चलते फिरते से ,
मन से लेकिन मरे हुए हैं लोग !
उनके चेहरे हसीन हैं लेकिन ,
ज़हर अंदर भरे हुए हैं लोग  !
गोलियां दागते हैं सीनों पर ,
बैर सबसे करे हुए हैं लोग !
शिकवा उनको है क्यों ज़माने से ,
खुद ही बिक कर धरे हुए हैं लोग !
जितना उनके करीब जाते हैं ,
उतना हमसे परे हुए हैं लोग  !

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