Thursday, 27 September 2012

ग़ज़ल 1 5 6 ( हमें आज खुद से हुई तब मुहब्बत )

हमें आज खुद से हुई तब मुहब्बत ,
किसी दिलरुबा की मिली जब मुहब्बत !
गये भूल जैसे सभी लोग जीना,
कहो जा के उनसे करें सब मुहब्बत !
नहीं मिल रहा है सभी ढूंढते हैं ,
मिलेगा खुदा जब बनी रब मुहब्बत !
चले जो मिटाने वो खुद मिट गये थे ,
कोई लाख चाहे मिटी कब मुहब्बत !
सिखाया है उनको यही बोलना बस,
कहेंगे हमेशा मेरे लब मुहब्बत !
नहीं नफरतों से मिलेगा कभी कुछ ,
उसे छोड़ कर तुम करो अब मुहब्बत  !
किसे चाहते हो किसे दिल दिया है ,
कहेगी किसी से किसी शब मुहब्बत !
वही ज़िंदगी प्यार जिसमे भरा हो ,
है जीने का तनहा यही ढब मुहब्बत !

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