Saturday, 15 September 2012

ग़ज़ल 1 5 5 ( अनबुझी इक प्यास हैं )

अनबुझी इक प्यास हैं ,
बन चुके इतिहास हैं !
जब बराबर हैं सभी ,
कुछ यहां क्यों ख़ास हैं  !
जुगनुओं को देख लो ,
रौशनी की आस हैं !
कह रहा खुद आसमां ,
हम जमीं के पास हैं  !
नाम उनका है खिज़ा ,
कह रहे मधुमास हैं  !       
लोग हर युग में रहे ,
झेलते बनवास हैं  !
हादिसे आने लगे ,
अब हमें कुछ रास हैं !
बेटियां बनने लगी ,
सास की अब सास हैं !
कह रहे "तनहा" किसे ,
हम तुम्हारे दास हैं  !

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