Wednesday, 5 September 2012

ग़ज़ल 1 5 3 ( हर हकीकत हुई इक फसाना है )

हर हक़ीकत हुई इक फसाना है ,
बस रहा चार दिन हर ज़माना है !
प्यार करने का दस्तूर इतना है ,
डूब जाये जिसे पार जाना है !
हो रहे ज़ुल्म कितने ज़मीं पर हैं ,
आसमां के खुदा को बताना है !
याद रखना उसे जो किया हमसे ,
एक दिन आ के वादा निभाना है !
जा रहे हम नये इक सफ़र पर हैं ,
फिर जहां से नहीं लौट पाना है !
भेजना ख़त नहीं अब मुझे कोई ,
ठौर अपना न कोई ठिकाना है !
प्यार में हर किसी को यही लगता ,
उनसे नाता बहुत ही पुराना है !
कुछ बताओ हमें क्या करें यारो ,
आज रूठे खुदा को मनाना है !
बांटता ही नहीं दर्द को "तनहा" ,
पास उसके यही बस खज़ाना है !

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