Sunday, 9 September 2012

ग़ज़ल 1 5 ( अपने हो कर भी हम से वो अनजान थे )

अपने हो कर भी हम से वो अनजान थे ,
बिन बुलाये-से हम एक मेहमान थे !
रख दिये  इक कली के मसल कर सभी ,
फूल बनने के उसके जो अरमान थे !
था तआरूफ तो कुछ और ही आपका ,
अपना क्या हम तो सिर्फ एक इंसान थे !
हम समझ कर गये थे उन्हें आईना ,
वो तो अपनी ही सूरत पे कुर्बान थे !
ग़म ज़माने के लिखते रहे उम्र भर ,
खुद जो एहसास-ए-ग़म से भी अनजान थे !
आदमी नाम हमने उन्हें दे दिया ,
आदमी की जो सूरत में शैतान थे !
महफिलों से निकाला बुला कर हमें ,
कद्रदानों के हम पर ये एहसान थे !  

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