Tuesday, 18 September 2012

ग़ज़ल 1 4 0 ( सभी को दास्ताँ अपनी बयाँ करना नहीं आता )

सभी को दास्तां अपनी बयां करना नहीं आता ,
कभी आता नहीं लिखना , कभी पढ़ना नहीं आता !
बड़ी ऊंची उड़ाने लोग भरते हैं , मगर सोचें ,
जमीं पर आएंगे कैसे अगर गिरना नहीं आता !
कभी भी मांगने से मौत दुनिया में नहीं मिलती ,
हमें जीना ही पड़ता है ,अगर मरना नहीं आता !
सभी से आप कहते हैं बहुत ही तेज़ है चलना ,
कभी उनको सहारा दो , जिन्हें चलना नहीं आता !
हमें सूली चढ़ा दो अब ,  हमारी आरज़ू है ये ,
यही कहना हमें है पर, हमें कहना नहीं आता !
न जाने किस तरह दुनिया ख़ुशी को ढूंढ़ लेती है ,
हमें सब लोग कहते हैं कि खुश रहना नहीं आता !
तमाशा बन गये "तनहा" , तमाशा देखने वाले ,
तमाशा मत कभी देखो , अगर बनना नहीं आता !