Sunday, 9 September 2012

ग़ज़ल 1 0 ( सभी कुछ था मगर पैसा नहीं था )

सभी कुछ था मगर पैसा नहीं था ,
कोई भी अब तो पहला-सा नहीं था !
गिला इसका नहीं बदला ज़माना ,
मगर वो शख्स तो ऐसा नहीं था !
खिला इक फूल तो बगिया में लेकिन ,
जो हमने चाहा था वैसा नहीं था !
न पूछो क्या हुआ ,भगवान जाने ,
मैं कैसा था कि मैं कैसा नहीं था !
जो देखा गौर से उस घर को मैंने ,
लगा मुझको ,वो घर जैसा नहीं था ! 

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