Saturday, 8 September 2012

बस बहुत हो चुका ( कविता ) 2 9 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कोई ,
तथाकथित ईश्वर ,
धर्म गुरु ,
कोई पूजास्थल ,
अब नहीं करेंगे ,
निर्णय ,
सही और गलत का  ! !
स्वर्ग या मोक्ष ,
की चाह ,
नर्क की सज़ा ,
का डर,
कर नहीं सकेंगे ,
विवश मुझे !
अब चलना होगा ,
सही मार्ग पर मुझे ,
छोड़ सब बातें ,
धर्मों की  !!
समाज के दोहरे मापदंड ,
हित अहित ,
मान अपमान की चिंता ,
रोक नहीं पाएंगे ,
मुझे अब कभी     ! !
बस बहुत हो चुका ,
जी सकूंगा कब तक ,
आडंबर के सहारे ! !
मुझे चलना होगा ,
उस राह पर ,
जिस पर चलना चाहे ,
मेरा मन ,
मेरी आत्मा ,
फिर चाहे जो भी हो !
कोई अन्तर्द्वंद ,
कोई ग्लानि ,
कोई पश्चाताप ,
सत्य और झूठ का ,
पुण्य और पाप का ,
अच्छाई और बुराई का ,
नहीं अब रहा बाकी  ! !
तय करेगा ,
केवल मेरा विवेक ,
और चलना है अब मुझे,
उसी मार्ग पर ,
जिसे सही मानता हूं मैं ,
मन से आत्मा से ! !

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