Sunday, 16 September 2012

ग़ज़ल 8 5 ( लोग कहते हैं कुछ , सोचते और हैं ) - लोक सेतिया "तनहा"

लोग कहते हैं कुछ , सोचते और हैं - लोक सेतिया "तनहा"

लोग कहते हैं कुछ , सोचते और हैं ,
हर किसी के हुए यूं अजब तौर हैं।

जा रहे हैं किधर ,कुछ न आता नज़र ,
समझ आता नहीं ,क्या नये दौर हैं।

इन मशीनों से जाने किसे क्या मिला ,
छिन गये कुछ गरीबों से बस कौर हैं।

भूख से मर रहे लोग कैसे जियें  ,
क्या कभी आप सब कर रहे गौर हैं।

बात दस्तूर की जब हो कहते नहीं ,
बन गए किसलिये आप सिरमौर हैं।

अब सभी पूछते हैं पता आपका ,
कुछ तो "तनहा" कहो अब कहां ठौर हैं। 

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